मित्रपक्ष
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मित्रपक्ष (अंग्रेज़ी: Allies, ऐलाइज़) उन व्यक्तियों, दलों, संस्थाओं या राष्ट्रों को कहते हैं जो किसी सांझे ध्येय के लिए एक-दूसरे से सहयोग करते हैं। यह ज़रूरी नहीं है कि उनमें आपस में कोई लिखित समझौता हो या वे किसी विधि से आपसी सहयोग करने के लिए बद्ध हों।[1] अक्सर मित्रपक्ष में मिलकर काम करने वालों में कोई भी औपचारिक समझौता नहीं होता। किसी युद्ध या सशस्त्र संघर्ष में इकट्ठे काम करने वाले देशों के गुट को भी 'मित्रपक्ष शक्तियाँ' (allied powers, ऐलाइड पावर्ज़) कहा जा सकता है। प्रथम विश्वयुद्ध और द्वितीय विश्वयुद्ध की चर्चाओं में यह 'मित्रपक्ष शक्तियों' वाला नाम विशेष रूप से ब्रिटेन, संयुक्त राज्य अमेरिका और उनके सहयोगी देशों के समूह जो दिया जाता है।
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मित्रपक्ष समय के साथ बदलते रहते हैं क्योंकि देशों के ध्येय बदलते हैं और अक्सर देश अपने बचाव के लिए अन्य देशों के साथ मित्रपक्षों में सहयोग करने पर मजबूर हो जाते हैं। मसलन रूसी साम्राज्य और उसके उत्तराधिकारी देश सोवियत संघ ने कई दफ़ा उत्तरी ईरान पर क़ब्ज़ा किया - १९वीं सदी में, प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान और १९४१ से लेकर १९४६ तक। इस से १९५० की दशक के बाद कई दशकों तक ईरान ने अमेरिका के नेतृत्व वाले मित्रपक्षों में सदस्यता ले ली, जैसे कि सेंटो (CENTO, केन्द्रीय संधि संगठन)।[2]
राजनीति के सम्बन्ध में
किसी देश या राज्य की राजनीति में 'मित्रपक्ष' शब्द उन राजनैतिक गुटों के लिए प्रयोग होता है जो कुछ समय के लिए कुछ ध्येयों को प्राप्त करने के लिए एक-दूसरे का साथ देते हों, चाहे वे ऐसा करने को वचनबद्ध हों या नहीं और चाहे वे ऐसा खुलकर करें या छुपकर।[3]
इन्हें भी देखें
- मित्रपक्ष शक्तियाँ
- नाटो (उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन)
सन्दर्भ
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